जाने क्यूँ अक्सर ऐसा होता है?
ओस की एक बूँद की चाह में मुर्झाया पुष्प भी खड़ा रहता है!
तन्हाई की शाम ढलती है मगर फिर से-
सुबेहा धुँध अंधेरा छाया रहता है!!
ओस की एक बूँद ने मुर्झाये पुष्प को आस् दिया,
जी ले हर क्षण – कहकर जिंदगी का प्यास दिया!
फिर से ललक जगी ज़िंदगी की उस पुष्प के अंदर,
जानकार परिणाम भी पुष्प ने अभिशाप लिया!!
ओस की बूँद ने दी ताजगी उस पुष्प को,
पुष्प भूल गया एक पल के लिए, गुजरे हर एक पल को!
भर गयी पुष्प की आँखें देख् कर ओस का हर एक अपनापन,
सोचा, जी ले आज, देखेंगे जो होगा, जब बिछरेंगे कल को!!
ओस की चाहत थी हर एक मुर्झाये को आस् दिलाना,
एक मुर्झाये पुष्प से किसी का क्य वास्ता?
पुष्प भी जनता था कि वो नहीं किसी के काबिल,
तमन्नाओ को कर दफन, ग़ुम हो जा अपनी बेबसी में ए शाहिल!
कभी अपनी हँसी पे
जवाब देंहटाएंरोना आये हमसे मिलना
दवा हम देँगे
बेताब ना हो
हर सवाल का है जवाब
कभी भूल जाऔ अपना घर
पता हम देँगे